बिलकुल जिद्दी होना जुर्म नहीं है....लेकिन पिता जी ने रेनोवेशन के वक्त भाई के लिए कमरा बनवाया...और आपके लिए नहीं..आपको अपनापन नही लगा। लेकिन आपने अपनी मां से पूछा कि क्या वो आपको अपना नहीं मानती...यदि सच है तो फिर उन्होंने आपको नौ माह गर्भ में क्यों रखा, आपके फिल्मों में करियर बनाने के फैसले पर भले ही उन्होंने ऐतराज जताया हो, लेकिन दिल्ली या मुंबई से खींचकर कमरे में नहीं कैद किया..लेकिन कंगना जी आपको अपनापन नहीं लगा।हो सकता है कि आप और आपके फैंस ये तर्क दें कि और भी लोग हैं जो नौ माह गर्भ में रखते हैं लेकिन जब बिटिया होती है तो उनका व्यवहार बदल जाता है बिटिया के लिए। पर, आपके पिता आपको किसी ख़तरे से रूबरू नहीं होने देना चाहते थे। लेकिन आपको अपनापन नहीं लगा। सन एंड सन में आपको चेक इन करना पड़ा, घुटना छिला..आपके पिता अपनी लाडली को ये खरोंच नहीं आने देना चाहते थे। दुर्भाग्य कि आपको फिर भी अपनापन नहीं नज़र आया अपने माता पिता के प्यार में। पता है आपको मनाली के गांव से मुंबई तक के सफर के बावजूद आपके मां-बाप आपकी हिफाजत की दुआएं मांगते रहे। भले ही वो कंडोम या फिर किसी सीन पर आपकी आंखें ब...
नसीरुद्दीन शाह ने पहले गोश्त खाना सिखाया फिर छोटी बोटी से शुरुआत की, और किरदारों में डूब चुका चेचक के दागों से भरा हुआ वो चेहरा, एक जोड़ी आंखों के साथ, माथे पर बल लिए मरना भी सीख गया। #RIP_ओमपुरी_साहब om-puri-passed-away ओमपुरी की जुबानी : "मैं जब एनएसडी में गया तो एकदम शाकाहारी था, लेकिन नसीर ने मुझे गोश्त खाना सिखाया''
तमिलनाडु के किसानों को मूत्र पीता देखकर बिलकुल भी असहज नहीं हुआ....क्योंकि देश की राजनीति का नया चित्रण कुछ इसी तर्ज पर हुआ था....पहले किन्नर पेटीकोट उठाते थे....तो हरे पटके में लिपटे इन किसानों ने सड़क पर नंगा नाच किया तो नया क्या है....इजाज़त पहले ही दे दी गई थी.....रही बात सरकार की तो....मोदी सरकार में अर्थव्यवस्था हवाई जहाज बन गई है....प्रवक्ताओं के जरिए रोज टेकऑफ करती है...और विपक्ष फिर लैंड करा देता है। लेकिन बनती बिगड़ती अर्थव्यवस्था के बीच किसान मूत्र पी रहे हैं...ये गौ मूत्र नहीं है...धार इंसान की थी और सरकार निशाने पर.... लोकतंंत्र के चौथे स्तंभ ने कैमरा जूम कर करके इंसान की पेशाब का पीलापन दिखाया....और उस पीलेपन में गोता लगाती विपक्ष की राजनीति को कॉन्सेप्ट कुमार ने अपने अंदाज में उस काले पर्दे के पीछे गायब कर दिया...जिसमें राष्ट्रवाद की परिभाषा कभी उकेरी गई थी....सब अपने अपने लिहाज से दिखा रहे हैं...जितना जो खरीदता है...उतना दिखाया जाता है...बाकी को शब्द की जुगाली करके लिक्खाड़ टट्टी की तरह हग देते हैं...देश विकास की ओर बढ़े न बढ़े..लेकिन जिन लोगों ने अभी शू-...
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